अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों की संवृद्धि में एक प्रमुख बाधा स्वामी के पास पर्याप्त पूँजी, अर्थात् मार्ज़िन राशि का उपलब्ध न होना है। अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों की अल्प पूँजी आवश्यकता, उच्च संव्यवहार लागत, एमएसएमई प्रवर्तकों में ईक्विटी से जुड़ी जटिलताओं को समझने की कठिनाई, मूल्यांकन एवं निकासी संबंधी मुद्दों, स्वामित्व /नियंत्रण में कमी लाने के प्रति प्रवर्तकों का तैयार न होना / अनिच्छा रखना, आदि के कारण बाहरी ईक्विटी, अर्थात् निजी ईक्विटी / उद्यम पूँजी (वेंचर कैपिटल) भी दुर्लभ होता है। मार्ज़िन संबंधी अपेक्षा की पूर्ति में कमी के कारण, अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यम अक़्सर पर्याप्त कार्यशील पूँजी प्राप्त करने में पीछे रह जाते हैं, जो उनके व्यवसाय की अनिवार्य आवश्यकता होती है। अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों को अपनी संवृद्धि के लिए अपेक्षित कार्यकलापों, जैसे - विपणन(मार्केटिंग), ब्रांड निर्माण, वितरकों का नेटवर्क तैयार करने, तकनीकी जानकारी, सॉफ़्वेयरों की खरीदारी, ऊर्जा दक्षता एवं गुणवत्ता सुधार के उपकरण, विकास एवं अनुसंधान में निवेश, आदि के लिए भी ऋण सहायता जुटाने में कठिनाई होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि इन निवेशों से मूलत: आस्तियों का सृजन नहीं होता है (अर्थात् ये अमूर्त आस्तियाँ हैं) और इसलिए ऋणदाताओं को इनके संबंध में सुरक्षा संबंधी निश्चिंतता नहीं होती है।
अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्र के लिए सिडबी ने अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए संवृद्धि पूँजी एवं ईक्विटी सहायता की शुरूआत की है। इस योजना के अंतर्गत, सुपात्र अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों को ईक्विटी /अर्द्ध-ईक्विटी के रूप में सहायता दी जाती है।
भारत में, 90% से अधिक अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों का गठन भागीदारी /स्वामित्व वाली संस्था के रूप में होता है, जिनमें विशुद्ध ईक्विटी के रूप में निवेश कठिन होता है। इसके अलावा, सिडबी यह भी समझता है कि भारत में अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों से संबंधित अधिकतर व्यवसाय परिवारों के स्वामित्व में होते हैं, जिनमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी मूल्यों का निर्माण हुआ होता है। इन कारणों से, भारत में अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों को किसी बाहरी व्यक्ति/संस्था के पक्ष में अधिक मात्रा मे अपना स्वामित्व एवं नियंत्रण कम करना कठिन होता है। इसे देखते हुए, सिडबी ने, सर्वोत्तम वैश्विक परंपराओं के आधार पर, विभिन्न आकार और संघटन वाले अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए विभिन्न नवोन्मेषी वित्तीय लिखत/साधन शुरू किए हैं। इनमें गौण/सहायक ऋण (एसडी) शामिल है, जिसे सिडबी अर्द्ध-ईक्विटी के रूप में मानता है।
जहाँ सिडबी सुपात्र निगमित अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों को ईक्विटी / अर्द्ध-ईक्विटी संबद्ध सहायता प्रदान करता है, वहीं गौण ऋण सभी प्रकार के संघटन वाले अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों को अर्द्ध-ईक्विटी सहायता उपलब्ध कराता है। गौण पूँजी विश्व भर में अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय लिखत/साधन है, जिसमें ईक्विटी की जटिलताएँ न्यूनतम होती हैं और दस्तावेज़ीकरण सरल होता है। इसके फलस्वरूप, इसका वितरण शीघ्रता से किया जा सकता है और यह अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए कम लागत वाला भी है। यह आस्ति सुरक्षा /संपार्श्विक प्रतिभूति के बजाय व्यवसाय की सुदृढ़ता / नक़दी प्रवाह के समर्थन पर दिया जाता है। मूलधन की किस्तों पर आरंभिक ऋण स्थगन अवधि अधिक होने से, उद्यम की सफलता की अधिक संभावनाएँ सुनिश्चित होती हैं।
अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों के व्यापक क्षेत्रों तक पहुँचने के लिए, सिडबी प्रत्यक्ष निधीयन के अलावा, विभिन्न वितरण माध्यमों का उपयोग करेगा, जैसे - उद्यम पूँजी निधियों / गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों, आदि का चैनल भागीदारों के रूप में उपयोग और चुनिंदा गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों के साथ ऋण वितरण व्यवस्था, ताकि अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों की मार्ज़िन संबंधी और संवृद्धि संबंधी अन्य वास्तविक ज़रूरतों के लिए उन्हें संवृद्धि पूँजी उपलब्ध कराई जा सके।
अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यमों के लिए संवृद्धि पूँजी और ईक्विटी सहायता क्या है |
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अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए संवृद्धि पूँजी और ईक्विटी सहायता की आवश्यकता |
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संवृद्धि पूँजी और ईक्विटी सहायता के उपयोग |
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उत्पाद |
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पात्रता |
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प्रतिभूति (ऋण आधारित निवेशों के मामले में) |
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प्रतिफल दर |
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अन्य शर्तें |
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अत्यंत लघु, लघु व मध्यम उद्यमों को होने वाले लाभ |
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सिडबी को कैसे सम्पर्क करे |
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@@ मूर्त निवल मालियत से अभिप्रेत है- पूँजी + अधिमान शेयर (उस हिस्से को छोड़कर जो 3 वर्ष के भीतर प्रतिदेय है) + शेयर प्रीमियम + आरक्षितियाँ और अधिशेष – संचित हानियाँ- पुनर्मूल्यांकन आरक्षितियाँ – विविध व्यय जो बट्टे खाते न डाले गए हों- अमूर्त / अवास्तविक आस्तियाँ + पिछले अंकेक्षित तुलनपत्र की तारीख के बाद लाई गई पूँजी।